अंश से अर्जित हो जो मैं वही स्वरूप हूं,
कंठ नील है मेरा मैं ढाल हूं, मैं शूल हूं।
विभस्त हूं, विभोर हूं, विनम्र और विलीन मैं।

धरा प्रचंड हूं मैं ही समस्त मैं, संकीर्ण मैं।
आग से मैं खाक तक
है भोर मुझसे रात तक।

श्मशान मेरा वास और मैं
सुख से हूं कराह तक।
पवित्र हूं, अघोर हूं, मैं जीविका का सार हूं।

कण में बसता हू मैं,
मैं विश्व में अपार हूं ।
मैं श्वास हूं, विश्वास हूं, मैं मूल का आधार भी।

मैं सत्य हूं, मैं हूं शिवम, जीवन का सूत्रधार भी।
तिमिर हू मैं प्रकाश हूं मैं शोर में एकांत हूं।
मैं आदि हूं, हूं अंत भी, मैं काशी विश्वनाथ हूं।